लंबे दिन रात

Monday, January 2, 2012

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लंबे दिन रात

लंबे दिन हैं
गरम बहुत अब
लान बहुत है  
पेड़ बहुत कम
रात भी छोटी
बंद हवा भी.

जब दिन था लम्बा
और गर्म था 
गर रात थी लंबी और थी डंडी 
पेड़ बहुत थे नदी धवल थी
अलाव बहुत थे नहीं कठिन थी.

अब मंदिर मस्जिद
गिरजे गुरूद्वारे
है बहुत यहाँ
हर चौक सडक पर. 

भीड़ भी ज्यादा
भक्त नहीं कम
ईमान धर्म अब
शर्म हया  भी
है बहुत कम.

बाजार बड़े सब
चमकती माल गजब की
माल है सस्ते और दौड अजब सी  
कल भी यंही थी आज यहीं पर.

लोग बड़े अब
नेता और अफसर
बड़े हैं बाबू बड़े हैं दफ्तर
लोग गरीब यहाँ
सब कह्ते हरदम
बहुत काम है बाकि  
बने काम बहुत कम.
बने काम जहाँ पर
जब मिले है कीमत
लोग बड़े और बड़े है दफ्तर
बड़े है नेता बड़े है अवसर.
Jaipur January 2, 2012



खता

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क्या खता है मेरी
मुझे आज बता दो
मझधार  में छोड़ा
क्यों, मुझे बता दो.
क्यों  फूल को तोड़ा
क्यों  चमन उजाडा
चलो  इतना समझा दो .








कब तक ?

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धान-पान और सोना-मिटटी
जंगल-जीव, घास औ झाड़ी
जोर-झपट और जाल-कपट से
तुमने हमसे छीना  हथियाया
गांव गरीब का संसार उजाड़ा.

खून पसीना हमने बहाकर
रात रात भर हमने जग कर
तेरे शान-शौकत के महल बनाए
जगमग  करते शहर बसाये. 

पूजते  हो तुम सारे पत्थर
संग बीबी बच्चों के हरदम.
जाते हो तुम काबा मंदर
अमन मांगने, होने संपन्न.

दलाल स्ट्रीट और वाल स्ट्रीट पर
कब्ज़ा, साहिब, रहेगा कब तक? 
बीबी-बच्चे, गांव के हम सब
भूखे-प्यासे, नंगे बदन सब
खड़े  हुए हैं हर गली-सडक पर
हाथ  में लेकर ईंट औ पत्थर.