समय कैसा भी हो

Tuesday, December 13, 2011

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इंसानियत नहीं बदलती ,
समय कैसा भी हो ,
कैसे मचलते है रहनुमा,वजीर -प्यादे ,
बस ! दिख जाए पैसा, कैसा भी हो ,
दिने इलाही राम ने मर्यादा रखी,
बने रहे पुरषोत्तम -समय कैसा भी हो ,
इम्तिहान खुदा उसी का लेता है ,
जो नेकी ओ अख़लाक़ से वा बास्ता रहे ,समय कैसा भी हो ,
बाज़ अफराद फरिशते से होते है,इंसानियत की खिदमत करते है
फिर चाहे ओहदा कैसा भी हो ,
क्या फर्क पड़ता है ,
समय कैसा भी हो ,
तवाइफो ने निकाले ताजिये,वो शिदत से बंदगी में मुब्तला,
खुदा तो इबादत में पाकीजगी देखता है,
क्या फरक पड़ता है ,
पेशा कैसा भी हो !
वो मकाम बड़ा मुकदस था,मैं इबादत में खुद बा खुद झुक गया,
फिजा में सदा गूंजी मंदिर हो या मस्जिद,
क्या फर्क पड़ता है !

नवाजिश
नारायण बारेठ

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