बेटी: I
सबकी बेटी सुंदर स्पन्दित
पनघट
हारे थके माँ-बाप को हरदम
दे कोरे घड़े की झरती ठंडक.
बेटी सबकी एक अनूठा संबल
निष्ठुर मौसम जब दे सदमा
लिपट के बनती मखमल की कम्बल.
सबकी बेटी संबल हरदम.
बेटी: II
पता नहीं किस देशधर्म में
जन्मी थी पली थी.
पर मेरे घर आके थमी थी
फल-फूलों से भरपूर-सी टहनी
झुक, होले से हमदर्दी से,
हर शाम मुझे वो कहती थी:
'अम्मी, तेल लगादूँ?
सर सहला दूँ?
चाय बना दूँ?'
पर मेरे घर आके थमी थी
फल-फूलों से भरपूर-सी टहनी
झुक, होले से हमदर्दी से,
हर शाम मुझे वो कहती थी:
'अम्मी, तेल लगादूँ?
सर सहला दूँ?
चाय बना दूँ?'
पता नहीं वो कहाँ पढ़ी थी.
पर मेरे घर-आँखों में हरदम
इंद्रधनुष सी रमी सजी थी.
थी वो हम सब की बेटी
रब की रूह वो रखती थी.
Jaipur August 24,
2012
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